
देहरादून: केंद्र सरकार द्वारा संसद के शीतकालीन सत्र में मनरेगा का नाम बदलकर वीबी-जी राम-जी करने से जुड़ा विधेयक पेश किए जाने पर कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि नाम परिवर्तन के जरिए सरकार न सिर्फ जनता को भ्रमित कर रही है, बल्कि रोजगार की गारंटी वाली योजना को कमजोर करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इसी क्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता आलोक शर्मा ने देहरादून में प्रेस वार्ता कर केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की शुरुआत वर्ष 2005 में की गई थी। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इसे पहले 200 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया और बाद में पूरे देश में विस्तार दिया गया। इस योजना के तहत ग्रामीण परिवारों को 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई थी और कार्यों का निर्धारण ग्राम पंचायतों के स्तर पर किया जाता था।
आधिकारिक जानकारी
कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर वीबी-जी राम-जी करने का बिल पेश कर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को हटाने का प्रयास किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि योजना को धीरे-धीरे समाप्त करने की रणनीति है। उनका कहना है कि सरकार इसे “पैसा बचाओ योजना” में तब्दील करना चाहती है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों का कहना है कि मनरेगा गरीब और पिछड़े वर्गों के लिए जीवनरेखा साबित हुई है।
उनका मानना है कि नाम बदलने और स्वरूप में बदलाव से ग्रामीण रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
संख्या / आंकड़े
योजना के तहत प्रति परिवार 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी जाती थी।
कांग्रेस के अनुसार केंद्र सरकार अब राज्यों पर करीब 50 हजार करोड़ रुपये या उससे अधिक का वित्तीय बोझ डालना चाहती है।
प्रस्तावित ढांचे में केंद्र की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत और राज्यों की 40 प्रतिशत बताई जा रही है।
आगे क्या होगा
आलोक शर्मा ने कहा कि सबसे चिंता की बात यह है कि मनरेगा की डिमांड ड्रिवन प्रकृति को खत्म किया जा रहा है और उसकी जगह केंद्र द्वारा नियंत्रित सीमित विनियोजन प्रणाली लाई जा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि इससे संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा और छोटे राज्यों के लिए योजना को बनाए रखना कठिन हो जाएगा। कांग्रेस ने मांग की है कि इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेजा जाए, ताकि इस पर विस्तृत चर्चा और समीक्षा हो सके।






