
साहिया। जौनसार-बावर के आराध्य छत्रधारी चालदा महासू महाराज की पालकी गुरुवार को अपने चौथे रात्रि पड़ाव म्यारखेड़ा पहुंची, जहां भक्तों ने पुष्प वर्षा कर देवता का भव्य स्वागत किया। पालकी के दर्शन हेतु भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़े और पूरा क्षेत्र जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
पृष्ठभूमि / संदर्भ
जौनसार-बावर क्षेत्र में महामू देवताओं की पालकी यात्राएं सदियों पुरानी परंपरा हैं, जिनमें क्षेत्रीय लोग आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के साथ गहराई से जुड़े रहते हैं। चालदा महासू महाराज की प्रवास यात्रा हर बार हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यह यात्रा न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक मानी जाती है।
आधिकारिक जानकारी
यात्रा आयोजकों के अनुसार बुधवार रात भूपऊ गांव में प्रवास के बाद पालकी सुबह चौथे प्रवास के लिए निकल पड़ी। म्यारखेड़ा पहुंचने पर लोगों ने फूल, चावल और अखरोट अर्पित कर देवता के चरणों में प्रणाम किया।
विकासनगर विधायक मुन्ना सिंह चौहान और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान ने भी पालकी को कंधा देकर सुख-समृद्धि की कामना की।
हिमाचल सरकार के उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने बताया कि इस बार जिला सिरमौर के शिलाई क्षेत्र में पहली बार चालदा महासू महाराज की प्रवास यात्रा पश्मी गांव स्थित नवनिर्मित मंदिर में पहुंचेगी, जहां देवता एक वर्ष तक विराजमान रहेंगे।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रत्येक प्रवास पर क्षेत्र में आस्था का माहौल चरम पर पहुंच जाता है। महिलाओं और बुजुर्गों ने बताया कि भूपऊ से पालकी के रवाना होने के समय कई आंखें नम हो गईं, क्योंकि देवता को अपने गांव से जाने देना भावनात्मक क्षण होता है।
दर्शन को पहुंचे श्रद्धालुओं ने कहा कि पूरे क्षेत्र में त्योहार जैसा उत्साह है और लोग घंटों पैदल चलकर पालकी यात्रा में शामिल हो रहे हैं।
विशेषज्ञ टिप्पणी
सांस्कृतिक शोधकर्ताओं का मानना है कि जौनसार-बावर की देव परंपराएं उत्तराखंड की अनूठी विरासत हैं। पांडवकाल और लोककथाओं से जुड़े चालदा महासू महाराज क्षेत्र की पहचान हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस यात्रा का सामाजिक महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह लोगों को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़े रखती है।
आंकड़े / तथ्य
पालकी यात्रा में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु जुड़ रहे हैं।
इस बार यात्रा उत्तराखंड से हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले तक जाएगी।
14 दिसंबर को देवता पश्मी मंदिर में एक वर्ष तक विराजमान रहेंगे।
आगे क्या?
यात्रा 12 दिसंबर को सावड़ा में बुरायला जगथान की बागड़ी और 13 दिसंबर को द्राबिल (हिमाचल प्रदेश) में अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी। इसके बाद 14 दिसंबर 2025 को चालदा महासू महाराज पश्मी मंदिर में एक वर्ष के लिए विराजमान होंगे। प्रशासन और स्थानीय समितियां यात्रा के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं को सुनिश्चित कर रही हैं।







